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मेरी कहानी : उस रात की बात

कहानी : उस रात की बात - लेखिका : जया केतकी

शाम, वो ख़ुशबू और अपरिचिता के मधुरिम स्पर्श के बीच डूबते-उतरते सचिन को रास्ता पता ही नहीं चला. अपने किए पर सचिन को अजीब भी लग रहा था और प्यार भी आ रहा था. आख़िर कैसे हो गया यह सब? अपने आप से प्रश्न करता हुआ सचिन उन पलों की यादों में खो गया. वह सोचने लगा जो हुआ ठीक तो नहीं हुआ, पर ग़लती केवल उसकी तो नहीं थी. वह भी तो पूरी तरह शामिल थी. इन्फ़ेक्ट उसी ने तो पहल की थी…
फिर उसे याद आ गई उस रात की बहस, जो उसके और श्रद्धा के बीच हुई थी. श्रद्धा ने जैसे निर्णय ही कर लिया था मां न बनने का. और वही सब उसके दिमाग़ पर हावी था शायद.
उस रात सचिन काफ़ी परेशान था. शादी के लगभग तीन वर्ष होने को थे. दोनों की रिपोर्ट नॉर्मल थी. पता नहीं क्या कारण था कि अभी तक श्रद्धा कंसीव नहीं कर सकी थी. वह न चाहते हुए भी श्रद्धा की दिनचर्या पर नज़र रखने लगा था. देखा श्रद्धा नियमित रूप से कोई टेबलेट ले रही थी, संभवतः गर्भ निरोधक. उसे श्रद्धा के निर्णय से दुख हुआ, क्योंकि शादी से पहले उसने यह नहीं कहा था कि वो बच्चे नहीं चाहती… अन्यथा… वह समझ नहीं पा रहा था कि श्रद्धा ऐसा क्यों कर रही है? वह बच्चा चाहता था. जब से उसे पता चला, श्रद्धा बिना उसे बताए गोलियां ले रही है, उसने अपनी दिनचर्या ही बदल डाली. शाम को घर आते ही वह सामान एक ओर पटकता और बॉलीबाल खेलने क्लब चला जाता. थका हारा लौटता और खाना खाकर सो जाता. रात यूं ही गुज़र जाती. श्रद्धा की पहल पर भी सचिन का मन निजी पलों में नहीं रमता. और उस दिन श्रद्धा का फ़ैसला सुनकर वह निराश हो गया. श्रद्धा मां नहीं बनना चाहती थी. वह इन सब झंझटों से दूर रहना चाहती थी. सचिन ने श्रद्धा की मम्मी से बात की पर उन्होंने भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. उन्हें अपनी बेटी के फ़िगर और करियर की ज़्यादा चिंता थी. सचिन देखता था कि अधिकतर श्रद्धा वर्क फ्रॉम होम लेकर घर से ही काम करती है. वह ख़ुद अच्छा कमा लेता है. श्रद्धा की मां को पेंशन मिल रही है. इकलौती लड़की होने के कारण अपने पिता के छोड़े अच्छे ख़ासे बैंक बैलेंस की मालिक है वह. फिर भी उसे घर में नया मेहमान नहीं चाहिए…क्यों?

ऑफ़िस के काम से सचिन अक्सर बाहर जाता था. इसी सिलसिले में वह दिल्ली जा रहा था कि अचानक हुए ऐक्सिडेंट के कारण आगे की ट्रेनें रद्द कर दी गईं थीं. उसे इटारसी में ही उतरना पड़ा. उसने क्लॉक रूम में सामान रख दिया. स्टेशन की गहमागहमी से निजात पाने के लिए वह खेतों के किनारे चल पड़ा. सर्दियों में शाम जल्दी ढल जाती है. पेड़ों पर पंछियों की भीड़ लगने लगी थी. इतने दिनों से काम की आपाधापी में वह शहर की गतिविधियों में कितना व्यस्त हो गया था. यहां का वातावरण उसे अजीब सा सुकून दे रहा था. उसकी नज़र एक पेड़ के नीचे बेतरतीब_सी बैठी युवती पर ठहर गई. पास पहुंचकर देखा तो गाढ़े रानी रंग की पोशाक पहने वह युवती भी सचिन की तरह मुसाफ़िर ही लग रही थी.
सचिन उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ना ही चाहता था कि उसने पूछा,‘‘यहां ठहरने के लिए रूम कहां मिलेगा?’’
उसके इस प्रश्न से सचिन को यह तो समझ आ गया कि वो दोनों एक ही समस्या का हल ढूंढ़ रहे हैं, पर वह कोई त्वरित उत्तर नहीं दे पाया. उसके पास रखे सामान को ध्यान से देखा एक अटैची, एक बैग था. उसे चुप देखकर उसने फिर कुछ कहना चाहा. तभी सचिन ने  कहा,‘‘मैं भी रूम ही खोज रहा हूं.’’
इतना सुनते ही वह उछलकर खड़ी हो गई जैसे उसे कुबेर का ख़ज़ाना मिल गया हो. उसने अटैची का हैंडिल सचिन को थमाया और ख़ुद बैग घसीटते हुए उसके साथ चलने लगी. थोड़ी दूर पर कबेलू लगे घर दिखाई पड़ने लगे. उसने हौले से सचिन का हाथ पकड़ लिया और बेफ़िक्री से चलती रही. पास पहुंचने पर पता पड़ा कि वह तो एक छोटा_सा होटल है, जहां चाय-नाश्ता ही मिलता है. पूछने पर चाय वाले ने हाथ के इशारे से थोड़ा दूरी पर एक होटल बताया, जहां रात रुकने की व्यवस्था थी. तब तक वह चाय का ग्लास लेकर चाय पीने भी लगी थी.
होटल क्या था घर ही था. कड़कड़ाती सर्दी में एक औरत और एक आदमी काम में लगे थे. जगह छोटी थी, पर साफ़ थी. वह भट्टी के सामने खड़ी होकर हाथ सेकने लगी. सचिन वहीं कुर्सी पर बैठ गया. अम्मा दो ग्लासों में पानी लिए आई,‘‘का खेहो बेटा, रोटी सब्जी के दार चांउर.’’
‘‘आंटी, कमरा मिलेगा, सोने के लिए?’’
‘‘अम्मा पहले खाना लगा दो. एक प्लेट रोटी सब्ज़ी और एक प्लेट दाल-चावल,’’ हाथ के इशारे से सचिन ने उसे रोका.
स्टील की दो थालियों में खाना आ गया. खाना गरम और स्वादिष्ट था. खाना खाकर वे कमरे में आ गए. बेडरूम के नाम पर केवल बेड थे और रूम था. बाहर की तरफ बाथरूम था, जहां केवल नहाया जा सकता था. उसमें भी दरवाज़े की जगह पर्दा लगा था.
टॉयलेट का पूछने पर अम्मा ने दूर बने शौचालय की तरफ उंगली दिखाई. घुप्प अंधेरे में उसका पीला दरवाजा ही दिखाई दे रहा था. सचिन ने उसे टॉयलेट जाने का इशारा किया. जब वह कमरे में लौटा तो देखा वह नाइट सूट पहने पलंग पर लेटी थी. जास्मिन की भीनी भीनी ख़ुशबू पूरे कमरे में फैली थी. दूसरी ओर पड़े खाली पलंग पर वह भी लेट गया.
सचिन सोचने लगा, कौन है यह? क्या यह मुझे जानती है. मैं तो इससे पहले कभी नहीं मिला. फिर इतनी बेतकल्लुफ़ी से कैसे मेरे साथ सो सकती है? वह ख़ुद से ही बातें कर रहा था. ठंड के कारण नींद नहीं आ रही थी. करवटें बदलते हुए काफ़ी समय बीत गया. अचानक उसे किसी के ठंडे हाथों का स्पर्श महसूस हुआ. क़रीब आती जास्मिन की महक से उसने अपने को बहकता पाया. कमरे का माहौल इतना रोमांटिक हो गया कि सचिन ख़ुद पर क़ाबू न रख सका. फिर जो हुआ वह सचिन के जीवन की अमूल्य निधि बन गया.

फ़ोन की घंटी से सचिन की नींद टूटी. उसने देखा आसपास कोई नहीं था. फ़ोन किसी अननोन लैंडलाइन नंबर से था. दूसरी ओर से स्वर उभरा,‘‘मि मेहरोत्रा कहां हैं आप?’’
हड़बड़ाकर सचिन ने घड़ी देखी, सुबह के आठ बज रहे थे.
‘‘सर मैं… वो ऐक्सिडेंट… मेरी ट्रेन…कैंसल…’’
‘‘मि महरोत्रा, आर यू ओके?’’
‘‘जी, सर… जल्द से जल्द आने की कोशिश कर रहा हूं,’’ यह कहते हुए सचिन ने ख़ुद को संभाला. इधर-उधर देखा कोई भी नहीं था. शायद वह जा चुकी थी. उसने मेन रोड पर आकर टैक्सी ले ली. रास्तेभर वह उस रात के हसीन पलों का जोड़-घटाना करता रहा. थोड़ा अच्छा, थोड़ा ख़राब…पर वह अजीब_सी शांति महसूस कर रहा था.
उस रात के उन हसीन पलों को किससे शेयर करे, सचिन के पास कोई अंतरंग मित्र नहीं था. और बताने पर शायद कोई उसकी इन बातों पर विश्वास भी न करता. और श्रद्धा को बताने का तो सवाल ही नहीं उठता था! पर जब भी वह अकेला होता उन ख़ूबसूरत लम्हों का साया उसके साथ होता और वह खो जाया करता था उन हंसी पल की यादों में.
लगभग चार माह बीत गए. सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था. वही ऑफ़िस, वही घर, वही मीटिंग्स. सबकुछ टाइप्ड-सा हो गया था. पर आज तो उसका काम में मन ही नहीं लग रहा था. न तो सचिन के पास उसका नंबर था और न कोई जानकारी. दो-एक बार स्टेशन से पता करने की कोशिश भी की पर कुछ हाथ न लगा. एक दिन ऑफ़िस में प्रवेश करते ही  जास्मिन की जानी-पहचानी ख़ुशबू ने सचिन का स्वागत किया. सचिन ने उसे अंदर आने का इशारा किया. उसने बिना औपचारिक बातचीत के बताया कि वह प्रेगनेन्ट है. सचिन ने घर जाने के बहाने हाफ़-डे लिया और उसे साथ लेकर ऑफ़िस से निकल पड़ा. दोनों एक रेस्तरां में बैठे. उसने बताया कि वह अविवाहित है और अब उसके लिए घर से बाहर निकलना मुश्क़िल हो गया है. वह जहां काम करती है, वहां इस बात का खुलासा
नहीं किया जा सकता अतः उसे नौकरी
छोड़नी होगी.

पहली बार सचिन को अपने निर्णय पर दुख हो रहा था. उस दिन का बहकना सही नहीं था, जैसे उसके लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया था सचिन ने. पर कहीं यह मुझे धोखा तो नहीं दे रही? नहीं, नहीं…यदि ऐसा होता तो मुझसे पैसों की मांग करती. वह तो सचिन को परेशान भी नहीं करना चाहती थी. हां, बच्चे को ज़रूर जन्म देना चाहती थी. केवल इसलिए कि उसके भीतर का ममत्व जाग गया था.
आज सचिन को सात जन्मों के रिश्ते पर एकाएक विश्वास-सा होने लगा. यह संयोग नहीं तो और क्या था कि एक एेक्सिडेंट के बहाने वह मिली. उसने सचिन की आंखों में न जाने वह सब कैसे पढ़ लिया, जो शायद आज तक श्रद्धा नहीं पढ़ पाई थी. सचिन को बच्चे की बेतरह चाह थी, शायद यह सब इसलिए हुआ. वह इस तरह सामने आए अपने बच्चे को गंवाना नहीं चाहता था. बातों-बातों में उसने यह भी बताया कि उस सुबह जाते-जाते उसने सचिन की जेब से उसका विज़िटिंग कार्ड निकाल लिया था. इसी से उस तक
पहुंच सकी.
बहुत सोच-विचार के बाद सचिन ने छुट्टी के लिए अर्ज़ी दे दी. वह जैसी भी थी, जो भी सोचकर उसने सचिन से संबंध बनाए, पर उसने सचिन को न तो कभी असमय फ़ोन किया और न अन्य किसी भी प्रकार का आग्रह. पता नहीं कैसे उसने इन कठिन परिस्थितियों में समय काटा होगा. एक बार उसे दूसरे शहर में घर दिलाने के बाद सचिन फिर दोबारा जा भी नहीं पाया उसके पास. कई बार मन बनाया, लेकिन श्रद्धा के गिरते स्वास्थ्य और दूसरी परेशानियों से जा न पाया, पर फ़ोन से ख़बर लेता रहता और ख़र्चे पानी की व्यवस्था भी समय पर करता.
प्रसव का समय निकट आ गया. एक सप्ताह के लिए ऑफ़िस के काम से बाहर जाने का कहकर सचिन निकल लिया. श्रद्धा इन सब बातों से अनभिज्ञ अपने जॉब में मगन थी. एक प्राइवेट नर्सिंग होम में उसने एक स्वस्थ और सुन्दर बच्ची को जन्म दिया. वह बहुत ख़ुश थी. बच्ची को पाकर सचिन को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह उसकी अपनी बेटी है. हफ़्तेभर बाद उसकी देखभाल की सारी व्यवस्था कर जब वह लौटा तो मन में सुकून था, क्योंकि उसे वह इस बात के लिए मना पाया था कि उनकी बच्ची की परवरिश यदि वह और श्रद्धा करेंगे तो न सिर्फ़ बच्ची को आगे जाकर आसानी होगी, बल्कि वह ख़ुद वापस नौकरी कर सकेगी. और अच्छी बात यह थी कि वह इस शर्त पर कि सचिन उसे कभी-कभी उससे ज़रूर मिलाएगा, इसके लिए मान भी गई थी.
अपनी बेटी को घर लाना एक नई समस्या थी. सचिन कोई बहाना तलाश कर रहा था. उसने श्रद्धा से बच्चा गोद लेने की बात की. वह तैयार नहीं हुई, पर जब सचिन ने उसे समझाया कि हम आया रख लेंगे उसकी परवरिश के लिए तो वह राजी हो गई. पर श्रद्धा ने शर्त रखी कि वे बेटी ही गोद लेंगे और उसकी देखभाल सचिन ख़ुद करेगा. इससे सचिन की मुश्क़िल आसान हो गई. सचिन ने मनु को गोद लेने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी. जल्दी ही मनु घर आ गई. श्रद्धा कुछ दिनों तक मनु से दूर-दूर रही फिर अपने आप सचिन का साथ देने लगी. धीरे-धीरे श्रद्धा मनु का बहुत ध्यान रखने लगी. सचिन कभी-कभी आशंकित हो जाता कि कहीं वह घर आकर श्रद्धा को सबकुछ बता न दे. हालांकि जब भी वह मनु को उससे मिलाने ले जाता, वह ऐसा कुछ नहीं कहती थी. फिर भी एक अनजाना डर सचिन के मन में बना रहता. अब मनु तीन बरस की होने जा रही थी. इस बार जब वह मनु को उससे मिलाने ले गया. उसने कहा,‘‘अब मनु बड़ी हो रही है. तुम उसे मुझसे मिलाने मत लाया करो. मैं नहीं चाहती वह हमारे सच को जाने और इसकी वजह से तुम्हारा घर बिखरे. मैं अगले माह ही इस शहर से दूर चली जाऊंगी. हां, तुम मुझे मनु के हर जन्मदिन पर उसकी एक तस्वीर मेरे मेल पर ज़रूर भेज दिया करना.’’ सचिन के जवाब का इंतज़ार किए बिना, मनु के माथे पर एक चुंबन अंकित कर वह सचिन के जीवन से बहुत दूर चली गई. सचिन इस अनजाने से रिश्ते के बंधन में बंधा आज भी मनु के हर जन्मदिन पर तस्वीर खींचकर उसे ईमेल किया करता है और उसके जवाब में हमेशा उसे वापस मिलती है एक स्माइली.

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